shiromani mathur - Stories, Read and Download free PDF

राहें - 14

by shiromani mathur
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मरना तो हैसाकेत कई दिनों से परेशान हो रहा था। बेटी की शादी कीतैयारी पूरी हो चुकी थी, कल ...

राहें - 13

by shiromani mathur
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राहेंगर्मी का मौसम, तेज धूप और गर्म तेज चलती हवायें वातावरणको शुष्क बनायें हुयी थी। पलंग पर बैठा किशोर ...

राहें - 12

by shiromani mathur
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नया घरकई दिनों से अंकित के घर की सजावट हो रही थी। सुन्दरभवन को रंग बिरंगी लाइट की झालरों ...

राहें - 11

by shiromani mathur
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समय-चक्रनितिन चिल्लाते हुये पत्नी से बोला - आज भाभी के मायकेवाले बिना खाना खाये चले गये, तुम खाना नहीं ...

राहें - 10

by shiromani mathur
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जीवन की डगरबादल गरज रहे थे, अंधेरा घिर आया था सतीश साहब घर के बरामदे में बैठे, बदले मौसम ...

राहें - 9

by shiromani mathur
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होली ...

राहें - 8

by shiromani mathur
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नमक हरामसंध्या का समय, झीने धुंधलके के कारण वातावरण धूमिल था। देखते ही देखते सड़क पर तीव्र गति से ...

राहें - 7

by shiromani mathur
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आज का सत्यभवन निर्माण का कार्य चल रहा था। पवन काम की देखभालकर रहा था, तभी एक अपरिचित व्यक्ति ...

राहें - 6

by shiromani mathur
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पुत्र सुखमनु खाना खाने बैठा - थाली की सब्जी में बाल उसे फिर दिखगया, बाल देखते ही मनु जोर ...

राहें - 5

by shiromani mathur
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अकेलापनभरी दोपहरी में भी सड़क सूनसान, चारों ओर सन्नाटा औरपुलिस वालों की मात्र पहरेदारी थी। अन्नू अपने 7 वर्षीय ...