Rakesh Kaul - Stories, Read and Download free PDF

लौ को एहसास नहीं मोम के दर्द का

by Rakesh Kaul
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लौ को एहसास नहीं मोम के दर्द का आज काफ़ी कोशिशों के बावजूद भी घर से निकलने ...

मिठास ज़िंदगी की

by Rakesh Kaul
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मिठास ज़िंदगी की बीना के जाने के बाद आज मैं ख़ुद को बिलकुल तन्हा महसूस कर रहा हूँ | ...

अभी भी कहीं ज़िंदा है ज़मीर

by Rakesh Kaul
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अभी भी कहीं ज़िंदा है ज़मीर आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो यक़ीन ही नहीं होता ...

सुबह का तारा

by Rakesh Kaul
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सुबह का तारा आज के नए ज़माने के शहरों में ज़्यादातर तालीमयाफ़्ता नौजवान अच्छी नौकरी की तलाश में घर-परिवार ...

आ अब लौट चलें

by Rakesh Kaul
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आ अब लौट चलें आज सुबह से मेरी तबियत कुछ अनमनी सी हो रही है | सिर में भी ...

बहारें फिर भी आती हैं

by Rakesh Kaul
  • 5k

बहारें फिर भी आती हैं आज सुबह थोड़ी देर से नींद खुली थी | आनंद तो अभी भी गहरी ...

सच्ची पहचान

by Rakesh Kaul
  • 5.5k

सच्ची पहचान एक हफ़्ते की रौनक के बाद आज अचानक घर में सूना-सूना लग रहा है | करीब एक ...

लोकतंत्र का प्रभाव

by Rakesh Kaul
  • 4.7k

लोकतंत्र का प्रभाव एक दफ़ा की बात है एक गाँव में तालाब के चारों ओर बहुत सारे घने दरख़्त ...

लाईका

by Rakesh Kaul
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लाईका यह कहानी एक रूसी कुतिया “लाईका” की ज़िंदगी पर आधारित है जिसे पहली बार स्पेस में जाने ...

It is still not too late

by Rakesh Kaul
  • 4.5k

It is still not too late I reached my hotel at about eight o’ clock in the evening. I ...