ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या"कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५भावार्थ --पदच्छेद (संकेतात्मक)कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)भावार्थ--प्रात: जागने ...
ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्याऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत ...
ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्यात्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ--ऋगुवेद,--१/११/२२भावार्थ --हे प्रभु!अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।मंत्र —“त्वं ज्योतिषा ...
ऋगुवेद सूक्ति--(२३) की व्याख्यामंत्र — ऋग्वेद १/१०४/९“पितेव नः शृणुहि हूयमानः …”पदच्छेद--पितेव — नः — शृणुहि — हूयमानःशाब्दिक अर्थ--पितेव = ...
ऋगुवेद सूक्ति-- (२४) की व्याख्या“अघृणे न ते सख्याय पह्युवे” — ऋगुवेद _१/१३८/४भावार्थ --हे प्रभु ! मैंतेरी मित्रता से इन्कार ...
ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्यामंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।यह ...
ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्यामंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।यह ...
ऋगुवेद सूक्ति--(२६) की व्याख्यामंत्र:अपृणन्तिमभि सं यन्ति शोका:।— ऋग्वेद १.१२५.७भावार्थ --उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है।पदच्छेद--अपृणन्तिम् + अभि + ...
ऋगुवेद सूक्ति--(२७) की व्याख्यामन्त्र —“मा प्रगाम पथोवयम्” ऋग्वेद_ १०.५७.१भावार्थ --हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।पदच्छेदमा — नहींप्रगाम — ...
ऋगुवेद सूक्ति--(२८) की व्याख्यामन्त्र--“उत देवा अवहित देवा: उन्नदेवा पुनः:”। --ऋग्वेद १०.१३७.१भावार्थ --गिरे हुओं को पुनः उठाओं।यह मन्त्र ऋग्वेद के ...