Vrajesh Shashikant Dave - Stories, Read and Download free PDF

अन्तर्निहित - 36

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 372

[36]“प्रात: काल की नूतन ऊर्जा और गुरुजी के आशीष से मैं अपने मार्ग पर चलने को सज्ज हूँ। तुम ...

अन्तर्निहित - 35

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 447

[35]वत्सर ने संध्या आरती सम्पन्न की। कृष्ण के अधरों पर स्थित बाँसुरी को उठाया और शीला पर बैठकर नित्यक्रम ...

अन्तर्निहित - 34

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 1.1k

[34]शैल ने सारा के साथ आश्रम में प्रवेश किया। संध्या हो चुकी थी। आश्रम में विशेष गतिविधियां नहीं दिख ...

अन्तर्निहित - 33

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 885

[33]गहन सांस लेकर वह बोली, “यह गांधी का देश है। मेरी बात सुनकर तुम्हें बूरा लग सकता है। संभव ...

अन्तर्निहित - 32

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 948

[32]“विभाजन के साथ ही प्रारंभ हुआ स्थानांतरण। लाखों लाखों लोग अपने स्थायी स्थान को छोड़कर अच्छे और सुरक्षित भविष्य ...

अन्तर्निहित - 31

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 882

[31]सोनिया और राहुल ने मीरा घटना के सभी कागजों, फ़ाइलों, चित्रों, रिपोर्टों, चलचित्रों आदि का अभ्यास प्रारंभ कर दिया। ...

अन्तर्निहित - 30

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 1k

[30]‘शैल को गए इतना समय हो गया। अभी तक नहीं लौटा। क्या कभी नहीं लौटेगा?’‘संभव है सारा, सब कुछ ...

अन्तर्निहित - 29

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 1.6k

29]“आप?” दोनों ने एक साथ पूछा।“हाँ, मैं। इतने दिनों के समय में आप के पास कोई ठोस प्रमाण नहीं ...

अन्तर्निहित - 28

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 1.1k

[28]“तो अब आप पदयात्रा पर जाना चाहते हो श्रीमान शैल?” अधिकारी ने व्यंग रचा। शैल ने उस व्यंग को ...

अन्तर्निहित - 27

by Vrajesh Shashikant Dave
  • 1.2k

[27]“घटना स्थल पर भी कुछ नहीं मिला, शैल?”“मिलता भी कैसे?”“क्यों?”“वह स्थल घटना स्थल है ही नहीं।”“क्या कह रहे हो? ...